MKMKMHH-PROOF-उत्कर्ष प्रकाशन
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MKMKMHH-PROOF-उत्कर्ष प्रकाशन

“मैख़ाने की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं”<br><br>“मैख़ाने की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं” <br>के उनवान के तहत श्री छत्र पालजी मुख़तलिफ़ <br>शुअरा के मुंतख़ब अश्आर का मज़्मुआ कारेईन <br>के हाथों में रखते हुये बक़ौले खुद अपनी <br>बेबज़ाअती और कमइल्मी पर घबराहट महसूस <br>कर रहे हैं| उनका यह क़ौल दरअसल उनकी <br>इनकसारी (विनम्रता) है, वरना उन्होने मोतियों <br>का एक ज़ख़ीरा जो मुख़तलिफ़ शुअरा के ख़ज़ानों <br>में बंद था, उसे बड़ी काविश (मेहनत) और दिक़्क़ते <br>नज़र एक एक मोती चुन कर निकाला और अब <br>वो आप जौहरियों के सामने है| मुझे पूरा यक़ीन <br>है कि उनकी यह काविश मुकम्मिल तौर पर <br>कारआमद साबित होगी| कारेईन इससे न सिर्फ़ <br>लुत्फ़ अंदोज़ होंगे बल्कि मुस्तफ़ीद भी होंगे|<br><br>ग़ज़ल के मुख़तलिफ़ पहलुओं (मौज़ूआत) में एक <br>पहलू (मौज़ूअ) खुमरियात का भी है| चूंकि ग़ज़ल <br>बक़ौले ‘रफ़अत सरोश’ “अगर शहंशाहों के इशरतक़दों में<br>जाम लुटाती है, तो गरीब की कुटिया में चराग़े उम्मीद <br>बन कर झिलमिलाती है, अगर सदियों से पिसे हुवे <br>आवाम के दुख की ज़बान बनती है, तो जमाने की <br>तेज़ निगाहों से निगाहें मिलाकर इंकलाबियों की <br>ललकार बन जाती है|” इस तरह ग़ज़ल के ख़ज़ाने से <br>चुना हुआ एक एक मोती मिशअले राह बन जाती है|<br><br>चूंकि छत्र पालजी ने अपने इंतख़ाब में तक़रीबन <br>तमामतर अश्आर ग़ज़ल से ही चुने हैं, लिहाज़ा <br>ग़ज़ल और उसकी हैअत (ढांचा) की चर्चा भी ज़रूरी है|<br>ग़ज़ल का अपना एक मख़सूस मिजाज़ है और उसके <br>इसी मख़सूस मिजाज़ ने उसे बामे-उरूज़ पर पहुंचाया| <br>मुख़तलिफ़ दौर में दीगर असनाफ़े-सुख़न (साहित्यिक रूप) <br>ने बहुत उतार-चढ़ाव देखे लेकिन ग़ज़ल के आँगन में <br>कभी भी ज़वाल का साया दिखाई नहीं दिया| ग़ज़ल <br>की इसी सिफ़त के पेशे-नज़र ‘रशीद अहमद सिद्दीक़ी’ <br>कहते हैं “ग़ज़ल केवल सिनफ़े-सुख़न ही नहीं <br>मेयारे-सुख़न भी है”| ग़ज़ल के इसी मख़सूस मिजाज़ <br>ने उसे सेक्युलर बना दिया, जिसने ‘ग़ालिब’ से यह <br>कहलवाया-<br>“वफ़ादारी बशर्ते-उस्तवारी अस्ले ईमाँ है,<br>मरे बुतख़ाने में काबे में गाड़ो बह्मन को|”<br>या वली ने कहा था-<br>गर हुवा है तालिबे-आज़ादगी<br>बंदा मत हो सब्ह व जुन्नार का|<br>लफ़्जे-ग़ज़ल मुग़ाज़िलत से मश्तक़ है, जिस के <br>मानी महबूब से प्यार-मुहब्बत की बातें करना है| <br>इसी मुनासिबत से जहाँ उसमें इश्क़ व मुहब्बत <br>व उसकी वारदात जाम व मीना, हुस्न व इश्क़, <br>शराब व शबाब वग़ैरा का जिक्र मिलता है, <br>वहीं शेख़ व बरह्मन, दैर व हरम, कावा व बुतख़ाना, <br>मस्जिद व मंदिर, कलीसा, दीन व ईमान, कुफ़्र, तसबीह, <br>जुन्नार (जनेऊ) वग़ैरा का ज़िक्र भी वाफ़िर पैमाने <br>पर मिलता है, जो ग़ज़ल के सेक्युलर मिज़ाज को <br>अयां करता है|<br>कहा जाता है कि ग़ज़ल की इब्तदा क़सीदे के <br>इब्तदाई जुज़ तशबीब से हुई| तशबीब में शायर <br>इब्तदाई में माशूक़ की याद का या फ़र्हतबख़्श <br>क़ुद्रती मंज़र का जिक्र करता था| बाद में इसी <br>हिस्से को क़सीदे से अलग करके ग़ज़ल नाम <br>दिया गया| इसके अलावा एक और रिवायत भी है| <br>शायरी की इब्तदा तो इस्लाम से ही क़ब्ल अरबी <br>में हो चुकी थी, जिसे ‘अज़री’ नाम से जाना जाता था,<br> और उसमें ग़ज़ल की तमाम सिफ़ात मौज़ूद थीं| <br>‘अज़री’ का हर शेर मानी के एतवार से मुकम्मल <br>हुवा करता था रदीफ़ व काफिये का एहतमाम <br>किया जाता था| मौज़ू के एतवार से भी उसमें प्यार <br>मुहब्बत की दर्द भरी दास्तानें हुवा करती थीं| हिज़्र, <br>फिराक़, तनहाई, दर्दमंदी, हुस्न व इश्क़, जाम व मीना, <br>शराब व शबाब वग़ैरा तमाम लवाज़मात ‘अज़री’ में भी <br>पाये जाते थे, लिहाज़ा उसे ही ग़ज़ल का नाम दिया गया|<br>यूँ तो ग़ज़ल की इब्तदा अरबी के ज़ेरे असर हुई, लेकिन <br>ग़ज़ल के इर्त्क़ा में फ़ारसी शुअरा का बड़ा हिस्सा रहा है, <br>बल्कि यह कहा जा सकता है कि सही मानों में फ़ारसी <br>शुअरा ने ही ग़ज़ल को ग़ज़ल बनाया| ग्यारहवी सदी <br>आते-आते तो ग़ज़ल ने एक मशहूर और मज़बूत <br>सिनफ़ के तौर पर अपना लोहा मनवा लिया| <br>ग़ज़ल फ़ारसी के ज़रिये दीगर ज़बानों के अदब में दाख़िल <br>हुई, उनमें उर्दू अदब ने उसे ऐसा परवान चढ़ाया कि वह <br>उर्दू अदब की आबरू बन कर रह गई|<br><br>बक़ौल ‘डा0.खुर्शीद आलम’ “सच्ची बात तो यह है कि ग़ज़ल <br>दुनियाँ की तमाम शायरी में लासानी और सबसे ज़ियादा <br>लचकदार सिन्फ़े-सुख़न है|” और इसीलिए जाम व मीना, <br>कैफ़ व मस्ती, शराब व शबाब के साथ-साथ ज़िन्दगी के <br>दीगर मुखतलिफ़ मसाइल को भी बरतने की उसमें <br>मुकम्मल गुंजाइश है| वह तसव्वुफ़ की बात करती है, <br>तो ज़िन्दगी से जुड़े मसाइल, इंसानियत, दिलनवाज़ी <br>मज़हबी रवादारी व सेक्युलरिज़्म को भी फ़रामोश नहीं <br>करती| साथ ही रिवायत परस्ती, रियाकारी, मज़हबी दिखावा, <br>मज़हब के नाम पर इन्सानों को मुखतलिफ़ फ़िकरों में <br>बांटना वग़ैरा-वग़ैरा को इसने न सिर्फ़ लाइके-मलामत <br>व मज़म्मत समझा है, बल्कि ख़ुलेआम इनकी तर्दीद की है, <br>मज़ाक उड़ाया है| इसने शेख़ और बरह्मन के दरम्यान <br>कोई इम्तियाज़ नहीं बरता है| ग़ालिब का शेर देखिये-<br>कहाँ मैख़ाने का दरवाज़ा ग़ालिब, और कहाँ वाइज़?<br>पर इतना जानते हैं, कल वो जाता था कि हम निकले|<br>इंशा ने कहा था-<br>ये जो महंत बैठे हैं राधा के कुंड पर <br>अवतार बनके गिरते हैं परियों के झुंड पर|<br>ग़ज़ल मज़ाहिब की यकसानियत की तबलीग़ करती है| <br>बहरहाल इश्क़ व मस्ती, कैफ़ व ग़म, प्यार व मुहब्बत <br>का ज़िक्र, जाम व मीना के बग़ैर अधूरा रहता है, इतना <br>ही नहीं ग़ालिब ने तो यहाँ तक कह दिया है कि-<br>हर चंद हो मुशाहदा-ए-हक़ की गुफ़्तगू, <br>बनती नहीं है बादा-ओ-साग़र कहे बग़ैर|<br>जो भी हो ‘छत्र पालजी’ ने ग़ालिब के क़ौल पर अमल <br>करते हुये मुख़तलिफ़ मक़ामात पर जहां कहीं भी उन्हें <br>जाम व मीना दिखाई दिये, जमा करके आपकी ख़िदमत <br>में पेश कर दिये, जो उनकी वुसअते-नज़र, उनके ज़ौक़ <br>और फ़हम व फ़राहत की गीराई व गहराई का मज़हर <br>तो है ही, साथ ही आपके ज़ौक़ की भी कसौटी है|<br> प्रो. डा0. निसार अहमद अंसारी<br> भारतीय भाषा संस्कृति संस्थान <br> गूजरात विद्धापीठ, अहमदाबाद <br> 16 अप्रेल 2015 <br><br><br><br><br>

5/13/2026
Source: https://fliphtml5.com/bxkwh/kpcj

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